Vedic Astrology

लग्नस्थ शुक्र की रंग-बिरंगी दुनियां

 

" फूल है चाँद है क्या लगता है, भीड़ में सबसे जुदा लगता है |"

 

लग्नस्थ शुक्र की कुछ ऐसी ही बात है। हँसता, खिलखिलाता, मनमोहक सा सदाबहार फूल की तरह का व्यक्तित्व जिसमें नजाकत है, अदा है और शालीनता भी। एक सजा - संवरा, आकर्षक छवि, अंतस से एक सुन्दर कवि ! जिस पर नज़रे इनायत हो जाय, वो मालामाल हुआ ... सराबोर हो गया गीत, काव्य, छंद और सुर-संगीत से! जिस पर दिल आया उस पर दिल-ओ-जान तक न्योछावर और जिससे उखड जाय तो उसे जड़ से उखाड़ दे।

 

माया ( धन-दौलत) के पहाड़ की ऊंचाई पर खड़ा खुदा सा लगने वाला आदमी की सुख-समृधि का आलम का क्या कहिये - सागर में जैसे एक मछली (full range of abundance) !

 

शुक्र के प्रभुत्व में जीता और आगे बढ़ता जातक अक्सर स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है । सुन्दरता की रंग-बिरंगी दुनिया में इतना मशगुल हुआ कि सपनों की चकाचौंध की दुनियां के लिए सबकुछ उत्सर्ग होने लगा यहाँ तक की सत्य भी ! यही आलम प्रेम पथिक का भी है । कोई जात-धर्म की दीवार नहीं प्रेम ही दीन-ईमान । अब यही हुआ मजहब । कामदेव के वशीभूत यूँ ही जवानी बीत गयी । अब फूल की वो ताजगी ना रही । बाहिर से आशिकाना दिखने वाला शख्स अन्दर से दरवेश हो गया । घर-गृहस्ती ऐसी जैसे की मिट्टी वो भी जली हुई । कोई सुखी नहीं ।

 

आजकल का युवा शुक्र के विविध सांसारिक पहलुओं के पीछे पागल है । सपनों में मीलों दूर निकल जाने के बाद जब नींद खुलती है तब तक ज़मीनी हकीक़त बहुत बदल चुकी होती है । कुछ हद तक इसे जिया खान सूरज पंचोली सरीखे युवा के उदाहरण से समझ सकते है। रेव पार्टी में आनंदित हो रहे युवा की शाम और फिर उसकी अगली सुबह की वस्तु स्तिथि भी एक कथानक प्रस्तुत कर सकती है लग्नस्थ शुक्र को समझने में ।

 

लग्नस्थ शुक्र के मिज़ाज को दुसरे सन्दर्भ में चरणबद्ध रूप में आगे भी समझेंगे । जिसका सार तो बस इतना ही है की यदि यह ग्रह अच्छा हुआ तो भवसागर पार ले जाने वाली गाय की तरह है यह। और, ख़राब हुआ तो मानो ज़मींदार की अच्छी-खासी खेती की पकी-पकाई फसल में आग लग गयी और सब स्वाहा हो गया । बचा रह गया जला हुआ एक ख़जाना और एक बिखरा हुआ व्यक्तित्व